क्या लोगों के पास उनकी जिंदगी नहीं है?

आज ये हम सब के सामने बहुत बड़ा सवाल है।

आज के इस युग में लोग दूसरों के बारे में बाते करते हैं, दूसरों की जिंदगी में क्या हो रहा है..…?? दूसरे लोगों ने आज क्या खाया…?? किस तरह के कपड़े पहने हुए है..?? कहाँ घूमने गए..…??  वे करते क्या हैं..…?? जो इतने पैसे वाले हैं,  जरूर कोई दो नंबर का धंधा होगा।
दूसरों की जिंदगियों पर टिप्पणी करते हैं और न जाने क्या-क्या वे दूसरों के बारे में समझते और सोचते हैं बिना उनके कुछ भी बताए।

क्या लोगों के पास उनकी जिंदगी नहीं है…??

जो अपने बारे में भी सोच सके!

वो जीवन में क्या कर रहे हैं?

वो जीवन को कौन सी नई दिशा दे रहे हैं?

वो जीवन में जो हासिल करना चाहते हैं क्या वह सबकुछ इससे ही होगा?

अगर उत्तर हाँ है तो करते रहिए आप सही कर रहे हैं!
लेकिन अगर उत्तर नहीं में है तो इन प्रश्नों पर पुनः विचार जरूर करिए क्योंकि इनके उत्तर आपसे बेहतर कोई नहीं जानता।

जो दूसरों की जिंदगी को अपनी जिंदगी से जोड़ रहे हैं या तुलना कर रहे हैं सिर्फ उनके लिए ही उनका भविष्य गर्त में हैं।

उनकी जिंदगी में क्या हो रहा है इस वास्विकता से अनजान?  सामने वाले की जिंदगी में क्या हो रहा है? बस इसकी कल्पना में ही अपना समय व्यतीत करते हैं और आश्चर्य की बात यह है, उनको ये समय का सदुपयोग लगता है।

कितना निरर्थक जीवन?
और कितना कल्पनाओं से भरा जीवन होता है उनका….??

कुछ लोग दूसरों की जिंदगी को देख रहे हैं और सोच रहे हैं, काश मेरे पास भी इतना पैसा होता तो मैं भी ये सब कर पाता तो वही कुछ लोग यह सोच रहे हैं मुझे भी बिल्कुल ऐसी ही जिंदगी जीनी है लेकिन करते कुछ नहीं ऐसी जिंदगी जीने के लिए।

हम खुद कुछ पल का सुख और जीवनभर का  दुःख को न्योता देते हैं। हम अपनी तुलना उस व्यक्ति से करते हैं जो हमसे आर्थिकरूप से कमजोर हो या उससे जो हमसे आर्थिकरूप से मजबूत हो।

ये तुलना करना ही  कुछ पल का सुख और जीवनभर का दुःख दोनों को ही न्योता देना है, जब हम अपनी तुलना किसी आर्थिक स्थिति से कमजोर वाले से करते हैं तो खुशी होती है और इसके विपरीत जब हम अपनी तुलना किसी अमीर व्यक्ति के साथ करते हैं तो खुद को वहाँ न देखकर दुःखी होते हैं।

बात यह है कि तुलना करना एक-दूसरे से किसी प्रतिस्पर्धा से कम नहीं हैं एक ऐसी प्रतिस्पर्धा जो जीवनभर चलती है जिसमें कभी पल भर का सुख तो हो सकता है लेकिन संतुष्टि वो कभी नहीं मिलती।

सुख और संतुष्टि का संतुलन बनाये रखने के लिए हमें खुद को किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं डालना चाहिए।

हमारा किसी भी व्यक्ति के साथ तुलना करना ही गलत है। जब हम अपनी तुलना करना छोड़ देंगे और और दूसरों की जिंदगी में बेवजह का घुसना छोड़ देंगे तो सुख और संतुष्टि दोनों जीवन में एक साथ प्राप्त होंगे और उनका मेल ही हमारे जीवन को अनमोल बना देगा।

 Comparison is an act of violence against the self.” Iyanla Vanzant.

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Published by Kirti Dixit

I am human being like you!

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